सुनसान हवेली का आख़िरी मेहमान – भाग 2
Author : Divem Sharma | Published On : 03 Aug 2026
रात 11 बजे के बाद सब कुछ बदल गया
रात के लगभग ग्यारह बज चुके थे। हवेली के अंदर सन्नाटा इतना गहरा था कि चारों दोस्तों की साँसों की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी।
रोहित के चाचा ने घड़ी देखी।
11:02
उन्होंने मज़ाक में कहा,
"लगता है गाँव वालों की कहानियाँ सिर्फ डराने के लिए थीं।"
इतना कहते ही ऊपर की मंज़िल से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आने लगी।
टक...
कुछ सेकंड का सन्नाटा...
टक...
फिर एक और कदम...
ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी पैरों वाला इंसान लकड़ी के फर्श पर धीरे-धीरे चल रहा हो।
चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
इस बार किसी ने मज़ाक नहीं किया।
सीढ़ियों पर दिखी पहली परछाई
रोहित के चाचा सबसे आगे थे।
उन्होंने टॉर्च उठाई और सीढ़ियों की ओर बढ़े।
जैसे ही रोशनी ऊपर पहुँची...
सीढ़ियों के आख़िरी मोड़ पर किसी के खड़े होने का आभास हुआ।
सिर्फ दो सेकंड...
फिर वह आकृति गायब हो गई।
"किसी ने देखा?"
उन्होंने धीमी आवाज़ में पूछा।
तीनों दोस्तों ने एक साथ सिर हिलाया।
मतलब...
वह भ्रम नहीं था।
ऊपर का कमरा
ऊपर पहुँचकर उन्होंने हर कमरा खोलना शुरू किया।
पहला कमरा खाली था।
दूसरे कमरे में पुराना लकड़ी का पलंग रखा था।
तीसरे कमरे का दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।
अंदर जाते ही उन्हें ऐसा लगा जैसे कमरे का तापमान अचानक कई डिग्री कम हो गया हो।
इतनी ठंड कि साँस से धुआँ निकलने लगा।
दीवार पर एक पुरानी तस्वीर टंगी थी।
तस्वीर में पूरा परिवार मुस्कुरा रहा था।
लेकिन जब रोहित के दोस्त ने टॉर्च की रोशनी तस्वीर पर डाली...
एक अजीब बात दिखाई दी।
तस्वीर में मौजूद एक छोटी लड़की का चेहरा बाकी लोगों से अलग दिशा में था।
वह सीधे कैमरे की तरफ देख रही थी।
हालाँकि तस्वीर दीवार पर कई सालों से टंगी हुई थी।
बंद खिड़की अपने आप खुल गई
अचानक...
धड़ाम!
कमरे की बंद खिड़की अपने आप खुल गई।
तेज़ ठंडी हवा अंदर आई।
साथ ही किसी औरत के रोने जैसी बहुत हल्की आवाज़ सुनाई दी।
चारों लोग कुछ सेकंड तक बिल्कुल चुप रहे।
रोहित के एक दोस्त ने हिम्मत करके बाहर देखा।
पूरा आँगन खाली था।
लेकिन मिट्टी पर किसी के पैरों के ताज़ा निशान दिखाई दे रहे थे।
समस्या यह थी...
वे निशान हवेली की तरफ नहीं आ रहे थे।
वे हवेली से बाहर भी नहीं जा रहे थे।
वे बस आँगन के बीच में शुरू होकर वहीं खत्म हो रहे थे।
जैसे कोई अचानक हवा में गायब हो गया हो।
कैमरे की रिकॉर्डिंग
डर के बावजूद उन्होंने नीचे आकर कैमरे की रिकॉर्डिंग चेक करने का फैसला किया।
वीडियो चलाया गया।
शुरुआत में सब सामान्य था।
चारों लोग कैमरे के सामने बैठे हुए दिखाई दे रहे थे।
फिर लगभग 17 मिनट बाद...
स्क्रीन के दाएँ कोने में सफेद कपड़ों में कोई धीरे-धीरे चलता हुआ दिखाई दिया।
वह इंसान कैमरे के सामने से गुज़रा।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि उसी समय चारों दोस्त वीडियो में अपनी जगह बैठे हुए थे।
मतलब...
वीडियो में पाँचवाँ व्यक्ति कौन था?
सबने रिकॉर्डिंग दोबारा चलाई।
इस बार वह आकृति कैमरे की तरफ मुड़ी।
चेहरा पूरी तरह धुंधला था।
लेकिन उसकी आँखें असामान्य रूप से चमक रही थीं।
रोहित के एक दोस्त ने घबराकर कैमरा बंद कर दिया।
आधी रात का समय
रात के ठीक बारह बजे...
पूरी हवेली में लगी हुई पुरानी घड़ी एक साथ बजने लगी।
हालाँकि किसी भी घड़ी में बैटरी नहीं थी।
टन...
टन...
टन...
बारह बार घंटी बजने के बाद अचानक पूरा घर फिर से शांत हो गया।
इतने में ऊपर से किसी लड़की की हँसी सुनाई दी।
धीमी...
लेकिन बिल्कुल साफ।
वह हँसी धीरे-धीरे पूरे घर में गूँजने लगी।
चारों दोस्तों के रोंगटे खड़े हो चुके थे।
अब उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि शायद गाँव वाले झूठ नहीं बोल रहे थे।
वह कमरा जिसे खोलने से सब डरते थे
हवेली के पीछे एक छोटा कमरा था।
गाँव वालों ने उसी कमरे के बारे में सबसे ज़्यादा चेतावनी दी थी।
उसका दरवाज़ा बाहर से जंग लगी मोटी ज़ंजीर से बंद था।
काफी कोशिश के बाद ज़ंजीर टूट गई।
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
अंदर घुप अँधेरा था।
टॉर्च जलाते ही उन्होंने देखा—
एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी।
उसके सामने टूटा हुआ आईना।
और फर्श पर गोल घेरे में जली हुई मोमबत्तियों के निशान।
ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों पहले वहाँ कोई अजीब अनुष्ठान किया गया हो।
कमरे में कदम रखते ही रोहित के चाचा के कानों में किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
उन्होंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
उनके बाकी तीन दोस्तों ने कहा कि उन्होंने कोई आवाज़ नहीं सुनी।
अब रोहित के चाचा के माथे पर पसीना आने लगा था।
उन्हें पहली बार लगा कि यह जगह सामान्य नहीं है।
आईने में दिखाई दिया कोई और
कमरे के बीच में रखा टूटा हुआ आईना धूल से भरा हुआ था।
रोहित के दोस्त ने अपने हाथ से धूल साफ की।
आईने में चारों दोस्तों का प्रतिबिंब दिखाई दिया।
लेकिन कुछ ही सेकंड बाद...
प्रतिबिंब बदल गया।
चार लोगों की जगह पाँच आकृतियाँ दिखाई देने लगीं।
पाँचवीं आकृति बिल्कुल पीछे खड़ी थी।
उसके लंबे बाल चेहरे को ढके हुए थे।
घबराकर चारों ने तुरंत पीछे देखा।
कमरा खाली था।
फिर उन्होंने दोबारा आईने की तरफ देखा...
अब वहाँ सिर्फ चार लोग थे।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन सब समझ चुके थे कि अब इस हवेली में एक पल भी रुकना सुरक्षित नहीं है।
फिर भी उन्हें यह नहीं पता था...
कि असली डर अभी शुरू ही हुआ था।
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